
आप सभी को होली के पावन पर्व पर हार्दिक शुभकामनायें – अभय अमृत एवं सविता
Pakistan breaks the Australian invincibility jinx by defeating them at Colombo in their group A game by 4 wickets
Kevin O'Brien registers the fastest hundred of the world cup as Ireland complete the highest successful chase|
Shri Prabhakar Sharma, my father was born on January 29 in the year 1917..
Added on February 9 2011: Today I must thank him for being the guiding light in my life.. I wish I could also be a father like him and let Amrit have a good memorable and enjoyable childhood.. He was more than once standing by my side to support me in life when he must have known that I was not right.. There could only be one way I could ever repay his contributions towards my upbringing.. Learn a few lessons to be a good father to my twelve year old son Amrit.. Thanks for being a wonderful father, Dad.. |
(29 जनवरी 2010) |
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Pandit Bhimsen Joshi is no more with us.. The doyen of the Hindustani Classical Music breathed his last on January 24, 2011.. May he always be remembered for his huge contribution to his selected field of excellence.. recipient of Bharat Ratna..
May his soul rest in peace..
- Abhaya Sharma, Mumabi, India.
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यह रात लेकर सुबह नई आयेगी
तम छट चुका होगा प्रभा फिर छायेगी यह ज्ञात होगा कोकिला सुर में दुबारा गायेगी इस धरा पर आज फिर से धुन कॊई बजायेगी
हाथ में अपने लिये नव अस्त्र-शस्त्र हमसे मिलने आज फिर दुर्गा भवानी आयेगी शत्रुऒं का नाश कर फिर से जगत में नव शांति की स्थापना कर जायेगी
हम अभय का रूप धर कर जी सकेंगें जितना जी चाहेगा अमृत पी सकेंगें स्वर्ग की हम कल्पना कर भी सकेंगें बन के मानव फिर से जीवन जी सकेंगें
यह रात लेकर सुबह नई आयेगी तम छट चुका होगा प्रभा फिर छायेगी
अभय शर्मा, भारत, 5 अक्टूबर 2008 09.09 घंटे
October 17 2010: As a Dussehara gift
Hear it on chirbit http://chirb.it/x4fHkv |
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(1)
अनकही जो रह गईं है कह नही पाता है मन श्रम-परिश्रम घोर करके लिख नही पाता ये तन आज कैसे कह सकूंगा कह न पाया जो कभी लाख कोशिश कर चुका मन बांध न पाया अभी । |
(2)
तारों में सजते है सपने सपनों में सजते तारे खेल रहे ह्य आंख-मिचौली छुप जाते दिख जाते सभी नही मिला है मुझको तारा मुझको था जो सबसे प्यारा घूम रहा हूं ढूंढ रहा हूं बन कर मैं एक बंजारा मिलने में सुख हो कितना भी नही मिलने से मैं नही हारा । |
(3)
एक पथ पर चल रहे हैं है एक सी ही चांदनी धूप भी उतनी ही लगती और हवा सम मन लुभाती दुख में दुख और सुख में सुख है मिला सबको यहां पर क्यूं लगी है आपा-धापी और मची है सीना-जोरी जीतने में क्यों लगा है हर कोई अपनी हि बाज़ी क्या पता है डाल से जब है टूटता पत्ता कोई ले उड़ेगी यह हवा क्या ज्ञात है उसको कहीं । |
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(4)
मैं भंवर में डूबता जाता उतरता और नही कुछ सोच पाता और किनारे पर कभी भी क्या ठहर पाता कभी क्या पार लगता अपने जीवन की घड़ी का हूं मै कहां आभास पाता क्या घटेगा क्या बढ़ेगा क्या रुकेगा क्या बढ़ेगा पांव जब तक चल रहे हैं सांस भी चलती रहेगी हाथ जब तक काम करते ज़िंदगी तुझको मिलेगी सोच मत है हार कुछ भी जीत निश्चित ही मिलेगी ।
अभय शर्मा 15 जनवरी 2010 |
(5)
एक समय की बात सुनो यह समय तुम्हें समझाता है है समय बड़ा ही बलशाली यह सबको पार लगाता है तुम जहां आज हो कल कहां मिलोगे कल तुम थे कल वे होंगें कल-कल जीवन के पल होंगे यह आना जाना लगा रहेगा जीवन का पहिया चला चलेगा नह नियति की यह चाल नई बीती है सदियां गिन कई-कई यह समय-समय की बात सखे विरला जोगी ही परख सके बहती नदिया में बहता चल जितना है जीवन जीता चल । |
(6)
प्रति पल प्रति क्षण प्रति दिन के प्रति मै एक प्रतीक बना फिरता क्या मंज़िल का है मुझे पता ? कभी यहां बैठ कभी वहां पैठ दर-दर ठोकर खाता रहता उठता-गिरता गिरकर उठता फिर एक अचानक झोंके से उड़ चला देश एक अंजाने जहां लोग सभी थे बेगाने ना भाषा उनकी समझ सका ना अपनी ही समझा पाया मै हक्का-बक्का भौचक्का क्या सच था या एक सपना था ? |







