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अण्णा हज़ारे जीवनी एक दृढ़ निश्चयी सिपाही से समाज सुधारक, सूचना अधिकारों के एक महा योद्धा के रूप में अण्णा हज़ारे की चार दशकों की यात्रा अपने आप में एक अभूतपूर्व कहानी है । किसी प्रकार की हिंसा का सहारा लिये बिना जिस तरह उन्होने उजाड़-बंजर से दिखने वाले अपने गांव को एक आदर्श गांव की शक्ल दे डाली, किस तरह अपने लगनशील प्रयासों से से दिशाहीन नागरिकों में सूचना अधिकारों के प्रति जागरूकता पैदा करने में सफलता हासिल की उनकी सिद्धी के कुछ महत्वपूर्ण अंश है । फिर ग्राम पंचायतों की सामर्थ्य शक्ति बढाने की दिशा में या योग्य सरकारी कर्मचारियों के बेबुनियादी तबादले रुकवाने से लेकर सरकार की लाल फीताशाही नीतियों का विरोध करने के लिये उन्हे कई बार सम्मानित किया जा चुका है । जब 1962 के भारत चीन युद्ध में हमारे सैनिक और सिपाही बेतहशा शहीद हो रहे थे तब भारत सरकार ने युवाओ से आर्मी में भर्ती होने की अपील की थी । इस अनुग्रह का भावुक तथा राष्ट्र भक्त अण्णा पर भी असर हुआ 1963 में वे सेना में शामिल हो गये । अपने 15 साल की सेवा काल में विषम परिस्थितियों वाले सिक्किम, भूटान, जम्मू कश्मीर, आसाम, मिजोराम तथा लेह लद्दाख जैसी जगहों पर अपनी सैन्य-सेवायें प्रदान कीं । जीवन में कई बार अण्णा निराशा से घिर जाते तथा विस्मित होकर जीवन के मूलभूत आधार पर ही सवाल कर बैठते । जीवन के संघर्ष पर वे विचार करते रहते, उनका दिमाग हमेशा ही जीवन के साधारण पर आधारभूत सवालों के हल ढ़ूंढने में व्यस्त रहता । एसे ही क्षणों में एक बार ऎसा भी समय आया जब उन्होने अपना जीवन तक समाप्त कर लेने का इरादा बना लिया था । इस संदर्भ में ‘मैं और क्यों नही जीना चाहता’ विषय पर दो पेज का निबंध ही लिख डाला था । भाग्य ने उनका सहारा दिया – एसे समय में बिल्कुल अनपेक्षित मार्ग से उन्हे प्रेरणा मिली । उन दिनों वे दिल्ली में थे, नई दिल्ली के एक बुक-स्टाल पर उनकी निगाह विवेकानंद की एक पुस्तक पर पड़ गई जिसे उन्होने तुरंत खरीद लिया । वे कहते है, जैसे जैसे वे किताब पढ़ते गये उनके कई सवालों के उत्तर उन्हे खुद ब खुद मिलते चले गये । पुस्तक से उन्हे प्रेरणा मिली कि मनुष्य जीवन का सर्वोत्तम मूल्य मानवता की सेवा करना है ।
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लड़ना ही अगर पड़ जाये कभी लड़ना तुम वीरों की भांति झुकना न कभी डरना न कभी मुश्किल को बना अपना साथी हो अदा तुम्हारी आंधी सी विपदायें कितनी भी आये मत हार मानना मन में कभी दुर्गम पथ पर चलना है तुम्हें विजयी होना है स्मरण रहे मन में ऎसा संकल्प लिये लडना ही अगर पड़ जाये कभी लड़ना तुम वीरों की भांति - अभय शर्मा
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