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Bhrashtachar Geet Kavita

माननीय अन्ना हज़ारे साहब

सादर चरण स्पर्श
 
आज आपके अनशन का बारहवां दिन है पर इन लोगों के कानों पर शायद अब तक जूं नही रेंग रही है, एक व्यंगात्मक कविता लिखी है अपने भृष्टाचार में लिप्त भाई बहनों के लिये, शायद आपका जिस रूप में कविता में प्रयोग किया है सर्वथा अनुचित है फिर भी आप की अनुमति चाहता हूं । फिल्म मिलन के गीत हम तुम युग युग से ये गीत मिलन के गाते रहेंगें पर आधारित यह कविता आपकी सेवा में प्रस्तुत है -
 
युग युग से हम भृष्ट रहे है भृष्ट रहेंगे
जग में सबको भृष्ट बनाकर चलते रहेंगे
चाहे कोई भूखा सोये या कोई पढाई ना कर पाये
जेबों को अपनी यूं हर दिन हम भरते रहेंगें
युग युग से हम भृष्ट बने और बनते रहेंगें
 
कोई अन्ना हो या कोई भी हो हम किसी से न डरने वाले
हमको पैसे से है मतलब हर काम के हम पैसे लेंगें
पर नही ज़रूरी है फिर भी हम काम तुम्हारा कर देंगें
युग युग से हम भृष्ट बने और बनते रहेंगें
 
जग इस पैसे की महिमा से कितना बनता अंजान यहां
कोई भी हो कैसा भी हो बस पैसे पर मरता है यहां  
 
ये अन्ना कहां से ले आये क्यों इसकी बात सुने ये जहां
इसके ना बीबी बच्चे हैं क्यों नोट कमायेगा बंदा
जनम जनम से लगता है नही सीखा कुछ गोरख धंधा
बस अनशन करता फिरता है क्या आंखों से है ये अंधा
हम तुम भृष्ट है जितने जग में सबको करेंगें
युग युग से हम
 
आओ हुम मिलकर इसको भी कुछ भृष्टाचार सिखा डालें
इस भूखे प्यासे अन्ना को हम कुछ तो भृष्ट बना डालें
माना नही लेता ये पैसे नही करता कैसी भी चोरी
पर कोई ना कोई  तो होगी सही इसकी भी कोई कमजोरी
हम भृष्ट है इतने दुनिया में कर सकते हम सीनाजोरी
युग युग से हम भृष्ट बने है बनते रहेंगे
 
भृष्ट  बनो, तुम भृष्ट रहो संग आज हमारे अन्ना जी
फिर खूब घुटेगी अपनी भी जब होंगे हम तुम धन्ना जी
ये अनशन तोड़ के आज चलो हम तुम्हें बना देते मंत्री
जैसे चलती है दुनिया चले कोई फिर न यहां होगा संत्री 
 
तुम देश बचाने के बदले इस देश को बेच के देखो जी
हम सारी दुनिया को मिलकर चलो भृष्ट बना दें आज सही
 
युग युग से हम भृष्ट रहे है भृष्ट रहेंगे
जग में सबको भृष्ट बनाकर चलते रहेगें ।
 
अभय शर्मा