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आदरणीय भाईसाहब

सादर चरण स्पर्श

 

सुजीत कुमार एवं आमिर के पिता के निधन पर उनके परिवार जनों को भावभीनी श्रृद्धांजलि के साथ मै आगे बढता हूं, वास्तव में मृत्यु ही जीवन की वास्तविकता है, फर्क अगर कुछ है तो बस इतना कि कोई आगे तो कोई पीछे जाता है पर जाना सब का तय है, अब तो मै भी लगभग जीवन की गली के उस मोड़ पर पहुंच गया हूंजहा कभी भी उस लोक से बुलाबा आ सकता है । चलिये यह कोई बहुत अच्छी बात नही है दिन का प्रारंभ करने के लिये , मूड को बदलते हुए मेरे पास उपलब्ध कविता-संग्रह से उद्दृत यह अंतिम कविता है जिसका समावेश उस दिन बच्चन संध्या में किया गया था, मुझे आप यैलो लाइन ना देकर उन कविताओं को उप्लब्ध कर सकें जो मेरे पास नही है तो इससे बढकर सुख मेरे लिये कुछ भी नही - मै सुख पर सुखमा पर रीझा प्रस्तुत है

 

आरती और अंगारे

तेरह

 

मैं सुख पर सुखमा पर रीझा, इसकी मुझको लाज नही है

 

जिसने अलियों के अधरों में

रस रक्खा पहले शरमाये,

जिसने अलियों के पंखों में

प्यास भरी वह सिर लटकाये

                  आंख करे वह नीची जिसने

                  यौवन का उन्माद उभारा,

मैं सुख पर सुखमा पर रीझा, इसकी मुझको लाज नही है ।

 

मन में सावन-भादों बरसे,

जीभ करे, पर, पानी-पानी !

चलती-फिरती है दुनिया में

बहुधा    ऎसी  बेईमानी,

                  पूर्वज मेरे, किंतु, ह्रदय की

        सच्चाई पर मिटते आये,

मधुवन भोगे, मरू उपदेशे मेरे वंश रिवाज नही है ।

मैं सुख पर सुखमा पर रीझा, इसकी मुझको लाज नही है ।

 

चला सफर पर जब तब मैंने

पथ पूछा अपने अनुभव से

अपनी एक  भूल से सीखा

ज्यादा, औरों के सच सौ से

                                    मैं  बोला  जो  मेरी नाड़ी

                                    में डोला, जो रग में घूमा,

मेरी वाणी  आज  किताबी नक्शों की  मोहताज नही है ।

मैं सुख पर सुखमा पर रीझा, इसकी मुझको लाज नही है ।

 

अधरामृत की उस तह तक मैं

पहुंचा विष को भी चख आया,

और गया सुख को पिछुआता

पीर जहां वह बनकर छाया,

                  मृत्यु गोद में जीवन अपनी

                  अंतिम  सीमा पर लेटा था,

राग जहां पर तीव्र अधिकतम है उसमें आवाज नही है ।

मैं सुख पर सुखमा पर रीझा, इसकी मुझको लाज नही है ।

 

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         डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन (मेरी श्रेष्ठ कवितायें पृष्ठ 263-264)

-         (संकलनकर्ता - अभय शर्मा)