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कवि बच्चन की आत्म-शक्ति का परिचय देते हुये अमित जी ने एक वाकया उपस्थित जन-समूह को सुनाया तो इसीमें उनके दृढ़ निश्चय, इच्छा-शक्ति के साथ-साथ उनके अंदर छिपे हुये कलाकार का भी परिचय मिल जाता है । किस्सा कुछ लम्बा है साथ ही रोचक भी इसे तृतीय खंड में रखने का निर्णय मेर नही मेरी पीठ का है, पीठ जबाव दे रही है ना मै कवि बच्चन जैसा आत्म-बल रखता हूं ना ही मेरे पास श्वेता की दी हुई सुखद कुर्सी है जिसका आपने आज सुबह फ़्यूज़ उड़ा दिया था । फिर भी जाने से पहले कोशिश करता हूं कि आपके लिये वह सहगान का मुखड़ा अवश्य ही उपलब्ध करा सकूं जिसका उपर वर्णन किया गया है –
तुम गा दो मेरा गन अमर हो जाए
(1)
मेरे वर्ण-वर्ण विश्रंखल,
चरण-चरण भरमाये,
गूंज-ग़ूजकर मिटने वाले
मैने गीत बनाये,
कूक हो गई हूक गगन की
कोकिल के कंठों पर,
तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाये ।
(2)
जब-जब जग ने कर फैलाये
मैने कोष लुटाया,
रंक हुआ मै निज निधि खोकर
जगती ने क्या पाया
भेंट न जिसमें मैं कुछ खोउं
पर तुम सब कुछ पाओ,
तुम ले लो, मेरा दान अमर हो जाये
तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाये ।
(3)
सुंदर और असुंदर जग में
मैने क्या न सराहा
इतनी ममतामय दुनिया में
मैं केवल अनचाहा;
देखूं अब किसकी रुकती है
आ मुझ पर अभिलाषा,
तुम रख लो, मेरा मान अमर हो जाये
तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाये ।
(4)
दुख से जीवन बीता फिर भी
शेष अभी कुछ रहता,
जीवन की अंतिम घड़ियों में
भी तुमसे यह कहता,
सुख की एक सांस पर होता
है अमरत्व निछावर,
तुम छू दो, मेरा प्राण अमर हो जाये
तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाये ।
अभय शर्मा
2 दिसंबर 2009 11.00 (रात्रि प्रहर)
बच्चन संध्या भाग – 3 तृतीय खंड
यह किस्सा भाईसाहब ने कवि बच्चन की आत्मशक्ति का परिचय देते हुये यूं सुनाया था – बाबूजी में गजब की आत्मशक्ति थी, एक दिन वे मेरे पास आये और कहने लगे चलो मेरे साथ चलो, आज मुझे तुम्हारी जरुरत है । मैं तैयार होकर जब उनके साथ हुआ तो कुछ 100 गज चलने के बाद वे एक भारी-भरकम पत्थर के पास आकर रुक गये । कहने लगे इस पत्थर को घर ले जाने में तुम्हारी मदद चाहिये । जाहिर सी बात है पत्थर वाकई काफ़ी भारी था, मुझसे तो वह टस से मस भी नही हुआ। बहरहाल घर के कुछ और लोगों की सहायता से जैसे-तैसे उसे कार में रख कर घर लाया गया । बाबूजी ने विजयी भाव से पत्थर कि ओर देखते हुये हमें समझाया यह कोई मामूली पत्थर नही साक्षात गरूड़ है, इशारे से उन्होने हम लोगोक को बताया कि देखो यह उनकी चोंच है, कटे हुये डैने दिखाये फिर बाद में उस पत्थर में ग भर कर उन्होने उसे गरूड़ का स्वरूप दे ही डाला ।
मैने पूछा बाबूजी यह सब तो ठीक है पर यह पत्थर यहां तक आया कैसे, यहां तो कोई पहाड़ी-वहाड़ी है नही, एका-एक कहां से गरूड़ जी हमारे घर के पास आकर विराजमान हो गये ? तब उन्होने असली कहानी बताई- कहने लगे तुम लोग जानते ही हो कि मै रोज सुबह एम्बैसी की तरफ़ घूमने जाता हूं, वहीं पहाड़ी इलाका है जहां पहले पहल मुझे इनके दर्शन हुये, हर रोज मै आधा इंच भर खिसका-खिसका कर उन्हे यहां तक ले आया जहां से हम लोग उन्हे घर लिवा लाये हैं । ऎसा गजब का आत्म-बल था डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन में ।
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