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प्रियवर अभिषेक तुम्हारे जन्म-दिवस की पूर्व-संध्या पर इच्छा तो बहुत थी कि मै स्वयं ही तुम्हारे लिये कोई कविता लिख पाता, मै जानता हूं कि मै असक्षम हू, असमर्थ हूं । मुझे यह कहते हुये विशेष हैरानी हो रही है कि उस दिन जब बच्चन संध्या पर तुम सपत्नीक मेरे सामने खड़े थे तुमसे कुछ भी नही कह पाया, आज तुम्हारी वर्षगांठ पर भी मै कहां कुछ कह पा रहा हूं । सब प्रयासों के बाद एक कविता तुम्हारे लिये ढूढ निकाली है, छोटी है पर सुंदर है, मात्र इसलिये नही कि कविवर बच्चन की इस कविता में मेरा नाम आया है, नही, नही यह बात नही है इसका प्रयोजन कुछ अन्य ही है – किसी अन्य दिन सविस्तार इसका वर्णन करने का प्रयास करूंगा – अभी तो तुम्हे यह कविता पढ कर ही संतोष करना होगा – जन्म-दिवस की अनन्य शुभकामनाओं सहित इस आशा के साथ कि तुम्हारा वर्तमान तथा भविष्य सदैव अज्ज्वल रहें, यह कविता प्रस्तुत है -
मेरा संबल
मैं जीवन की हर हलचल से कुछ पल सुखमय, अमरण-अक्षय चुन लेता हूं ।
मैं जग के हर कोलाहल में कुछ स्वर मधुमय, उन्मुक्त-अभय सुन लेता हूं ।
हर काल कठिन के बंधन से ले तार तरल कुछ मुद-मंगल मैं सुधि-पट पर बुन लेता हूं ।
डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन उद्धृत - मेरी श्रेष्ठ कवितायें – बच्चन (पृष्ठ 449-450) |
